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यूपी चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच हुआ गठबंधन

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तमाम सन्देहों को समाप्त करते हुए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने रविवार को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव पूर्व गठबंधन का औपचारिक ऐलान कर दिया। राजनीतिक परिस्थतियों की मजबूरी के चलते दोनों पार्टियों को एक ही नौका पर सवार होना पड़ा ताकि राज्य में 15 साल से सत्ता से बाहर रही भाजपा की वापसी को रोका जा सके। 
 
सीट बंटवारे को लेकर दोनों पक्षों की ओर से अपने रूख पर डटे रहने के कारण यह गठबंधन एक समय लगभग असंभव प्रतीत होने लगा था। किन्तु रविवार को दोनों पार्टियों के प्रदेश प्रमुखों ने संवाददाता सम्मेलन में घोषणा की कि राज्य की 403 विधानसभा सीटों में सपा 298 तथा कांग्रेस शेष 105 सीटों पर चुनाव मैदान में उतरेगी।
 
गठबंधन को लेकर चल रही बातचीत में एक दौर ऐसा भी आया जब सपा नेता नरेश अग्रवाल ने यहां तक कह दिया था कि गठबंधन की संभावना लगभग खत्म हो गयी है और उन्होंने इस गतिरोध के लिए कांग्रेस के अड़ियल रवैये को जिम्मेदार ठहराया।
 
सपा के प्रान्तीय अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल और उनके कांग्रेसी समकक्ष राज बब्बर ने यहां आयोजित संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में इस गठबंधन की घोषणा की। पटेल ने बताया कि साम्प्रदायिक शक्तियों तथा भाजपा को समूल उखाड़ने के संकल्प के साथ यह गठबंधन बनाया गया है।
 
राज बब्बर ने कहा कि विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस चुनावपूर्व गठबंधन के लिये आपस में तैयार हुए हैं। सपा और कांग्रेस की साझा वैचारिक ताकत भाजपा की धुव्रीकरण करने वाली विभाजन और विघटनकारी नीतियों को मजबूती से चुनौती देगी।
 
राज बब्बर ने कहा कि सपा और कांग्रेस का यह गठबंधन मुख्यमंत्री के अथक प्रयासों द्वारा किये गये रचनात्मक कार्यों की बुनियाद पर खड़ा है। और यह आगे बढ़ेगा। सपा और कांग्रेस के गठबंधन के सत्ता में आने पर एक हफ्ते के अंदर साझा न्यूनतम एजेंडा तैयार किया जाएगा। माना जा रहा था कि कांग्रेस 130 सीटों से कम पर राजी नहीं थी जबकि सपा उसे अधिकतम 85 सीटें ही देना चाहती थी। सपा ने गत शुक्रवार को अपने 210 उम्मीदवारों की सूची जारी करके कांग्रेस को कड़ा संदेश भी दिया था। उस वक्त लग रहा था कि अब यह गठबंधन नहीं बनेगा।
 
गठबंधन की घोषणा में हो रहे विलंब के कारणों में एक यह भी माना जा रहा था कि उप्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कथित रूप से इस बात से अप्रसन्न थे कि कांग्रेस नेतृत्व बातचीत के लिए किसी वरिष्ठ नेता को न भेजकर चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को भेज रहा था। बहरहाल, इस बातचीत में बाद में कांग्रेस का वरिष्ठ नेतृत्व शामिल हुआ और गठबंधन को अंतिम रूप दिया गया।
 
सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ने ट्वीट किया, यह सुझाव देना गलत होगा कि कांग्रेस पार्टी की ओर से लाइटवेट बातचीत कर रहे हैं। बातचीत उच्चतम स्तर पर हुई. मुख्यमंत्री (उप्र) और महासचिव कांग्रेस (गुलाम नबी आजाद) एवं प्रियंका गांधी के बीच।Т कांग्रेस महासचिव एवं उप्र प्रभारी आजाद भी यह कह चुके हैं कि प्रियंका ने पार्टी द्वारा लड़ी जाने वाली सीटों की पहचान करने और गठबंधन वार्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। प्रियंका अभी तक स्वयं को अमेठी और रायबरेली संसदीय क्षेत्र के चुनाव तक सीमित रखती रही हैं जिसका प्रतिनिधित्व उनके भाई राहुल गांधी एवं मां सोनिया गांधी करती हैं।
 
आजाद ने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा कि गठबंधन इसलिए किया गया है ताकि धर्मनिरपेक्ष वोटों के बंटवारे से बचा जा सके क्योंकि उससे भाजपा को लाभ मिलता है। उन्होंने मीडिया के एक वर्ग में आई इन खबरों को खारिज कर दिया कि वार्ता में इसलिए अड़चन आई क्योंकि कांग्रेस अमेठी एवं रायलबरेली संसदीय क्षेत्र के तहत आने वाली सभी विधानसभा सीटों की मांग कर रही थी।
 
आजाद ने कहा, ऐसी कोई बात नहीं है। हम प्रत्येक क्षेत्र में सीटें चाहते हैं, चाहे वे पूर्वी उप्र हो, पश्चिमी या मध्य उत्तर प्रदेश, या बुंदेलखंड हो पहले हमने अकेले उतरने के बारे में सोचा किन्तु बाद में इस विचार को त्याग दिया गया क्योंकि धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने महसूस किया कि भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए हमें साथ में आना चाहिए।Т कांग्रेस इस गठबंधन में अजीत सिंह नीत रालोद को भी शामिल करने को उत्सुक थी, किन्तु सपा इसके लिए राजी नहीं थी। सपा ने कहा कि वह रालोद को सीट देने को तैयार नहीं है और यदि कांग्रेस उसे साथ लेकर चलना चाहती है तो वह अपने हिस्से की कुछ सीटें उसको दे सकती है।
 
राजद के नेता लालू प्रसाद सहित कुछ नेताओं ने भी दोनों दलों के बीच गठबंधन कराने में पर्दे के पीछे रहकर भूमिका निभायी है। लालू के अखिलेश के साथ पारिवारिक संबंध हैं। वर्ष 2012 के उप्र विधानसभा चुनाव में सपा ने 29.3 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 224 सीटें जीती थीं जबकि कांग्रेस ने 11.7 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 28 सीटें जीती थीं।


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