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डोनाल्ड ट्रम्प इन दिनों वर्ल्ड लीडर्स से फोन पर बात कर रहे हैं। ये बातचीत इसलिए ज्यादा चर्चा में है क्योंकि वे सभी लीक से हटकर बर्ताव कर रहे हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि ऑस्ट्रेलियाई पीएम मैल्कम टर्नबुल के साथ बातचीत के दौरान ट्रम्प ने एकाएक फोन काट दिया। दोनों के बीच करीब एक घंटा बातचीत होनी थी, लेकिन 25 मिनट ही हो पाई। ट्रम्प ने यह तक कहा कि अब तक जितने भी लीडर्स से बात हुई, उनमें सबसे बदतर बातचीत आपसे हुई है। बता दें कि इससे पहले ऑस्ट्रेलिया को यूएस का अच्छा दोस्त माना जाता रहा है।
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प और टर्नबुल के बीच रिफ्यूजी डील को लेकर बातचीत बीते शनिवार हुई थी। डील के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया के एक डिटेंशन सेंटर में रह रहे 1,250 रिफ्यूजी को यूएस जाना था। टर्नबुल ने बातचीत में इसी का जिक्र किया। ट्रम्प ने इसके जवाब में कहा- "यह अब तक की सबसे खराब डील है।" ट्रम्प ने टर्नबुल पर आरोप लगाते हुए कहा कि वह बोस्टन पर अगला बम हमला करने वालों को अमेरिका में एक्सपोर्ट करने की कोशिश कर रहे हैं।
ट्रम्प ने टर्नबुल से कहा कि मैंने आपसे पहले चार और देशों के नेताओं से बातचीत की। इनमें व्लादिमीर पुतिन जैसे नेता शामिल हैं, लेकिन इन सभी में अभी तक आपके साथ बातचीत सबसे खराब रही।
टर्नबुल ने कहा कि भले ही प्रेसिडेंट ट्रम्प ने उनके साथ फोन पर बेरुखी से बातचीत की हो, लेकिन अमेरिका पहले ही ऑस्ट्रेलियन डिटेंशन सेंटर से 1250 रिफ्यूजियों को मंजूर करने का कमिटमेंट जाहिर कर चुका है।
ऑस्ट्रेलिया में ऐसी पॉलिसी है जो किसी दूसरे देश से बोट के जरिए रिफ्यूजियों की एंट्री को रोकती है। ऑस्ट्रेलियन डिटेंशन सेंटर में जो रिफ्यूजी मौजूद हैं, उनमें से ज्यादातर ईरान या इराक से आए थे। ये दोनों मुस्लिम देश उन सात देशों में शामिल हैं जिनसे एंट्री पर ट्रम्प ने 90 दिन का बैन लगाया है। इन्हीं रिफ्यूजियों को यूएस में एंट्री देने का ओबामा एडमिनिस्ट्रेशन ने ऑस्ट्रेलियाई सरकार के साथ एग्रीमेंट किया था।
द न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा- ट्रम्प और ऑस्ट्रेलियन पीएम के बीच फोन कॉल के बाद दोनों देशों के बीच डिप्लोमैटिक टकराव होने का खतरा है। दोनों ने रिफ्यूजी पॉलिसी को लेकर एकदूसरे के बारे में तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया है। द वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा- ट्रम्प का यह बर्ताव बताता है कि वे वर्ल्ड लीडर्स के सामने तीखी बात करने की काबिलियत रखते हैं, भले ही वे अमेरिका के सहयोगी देशों के नेता ही क्यों ना हों। वे अपनी स्पीच और ट्विटर के जरिए लगातार राजनीतिक विरोधियों और मीडिया संगठनों को कटघरे में खड़ा करते हैं।
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