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भारत में मधुमेह रोगियों की बढ़ती संख्या के बीच एक और चिंताजनक बात सामने आयी है| स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि गरीब तबके के लोग तेजी से इस बीमारी के शिकार हो रहे हैं|
एक अध्ययन में कहा गया है कि देश के विकसित राज्यों के शहरी इलाकों में रहने वाले सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों की उन लोगों के मुकाबले मधुमेह से पीड़ित होने की आशंका अधिक है जो राज्य के सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत तबके से ताल्लुक रखते हैं|
लांसेट डायबिटीज एंड एंडोक्रनालॉजी जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में कहा गया है कि इसके नतीजे भारत के लिए चिंताजनक है| जहां लोग इलाज पर अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च करते हैं| भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और स्वास्थ्य मंत्रालय के स्वास्थ्य शोध विभाग की मदद से किए गए इस अध्ययन में 15 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के 57,000 लोगों को शामिल किया गया|
रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्थिक रूप से अधिक सम्पन्न माने जाने वाले सात राज्यों के शहरी इलाकों में सामाजिक-आर्थिक रूप से अच्छी स्थिति वाले तबके के मुकाबले सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर तबके में मधुमेह के रोगियों की संख्या अधिक है|
उदाहरण के लिए, चंडीगढ़ के शहरी इलाकों में सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के बीच मधुमेह की दर 26.9 फीसदी पाई गई जो अच्छी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के बीच 12.9 प्रतिशत की दर से कहीं अधिक है|
एम्स के एंडोक्रनालॉजी और मेटाबॉलिज्म विभाग के प्रमुख डॉ. निखिल टंडन के अनुसार शहरों में तनावपूर्ण माहौल में रहना, खाने-पीने की आदतें और वजन बढ़ने तथा शरीर की चर्बी के साथ अधिक देर तक बैठना एवं व्यायाम ना करने से मधुमेह होने का खतरा बढ़ रहा है| उन्होंने कहा, यहां तक कि कम आय वाले वर्गों के लोग भी जंक फूड खा रहे हैं|
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